सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हिमाचल में भूमि राजस्व अधिनियम धारा 163-ए पर यथास्थिति कायम, किसानों और बागवानों को राहत
नई दिल्ली/20/09/2025
हिमाचल प्रदेश के किसानों और बागवानों के लिए बड़ी राहत भरी खबर है। सुप्रीम कोर्ट ने भूमि राजस्व अधिनियम की विवादित धारा 163-ए को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है। यह आदेश उस समय आया है, जब हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने 5 अगस्त 2025 को इस धारा को असंवैधानिक करार दिया था और सरकार को भूमि अतिक्रमणों पर बेदखली की कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।
मामला कैसे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा?
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ डॉ. ओंकार सिंह शाद, पूर्व महासचिव (सीपीएम से संबद्ध हिमाचल किसान सभा), ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की। यह याचिका 16 सितंबर को दाखिल की गई और 19 सितंबर को प्रारंभिक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ—न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता—ने इसे विचारार्थ स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगले आदेश तक यथास्थिति कायम रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि डॉ. शाद द्वारा दाखिल हस्तक्षेप आवेदन को मुख्य SLP के साथ टैग किया जाए, ताकि पूरे मामले की एक साथ सुनवाई हो सके।
धारा 163-ए क्यों विवादित है?
धारा 163-ए भूमि राजस्व प्रशासन की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं से जुड़ी है, जैसे नामांतरण और अभिलेख दुरुस्ती। हाईकोर्ट ने इसे मनमाना और असंवैधानिक करार देते हुए कहा था कि सरकार को भूमि अतिक्रमण पर बेदखली की कार्रवाई करनी चाहिए। इसके बाद हजारों किसानों और ग्रामीण भूमिधारकों के लिए संकट उत्पन्न हो गया था।
किसानों और ग्रामीणों की प्रतिक्रिया
डॉ. शाद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश किसानों और ग्रामीण भूमिधारकों के हितों की रक्षा की दिशा में अहम कदम है। यदि हाईकोर्ट का आदेश तत्काल लागू हो जाता, तो कई परिवार बेदखली के खतरे में पड़ सकते थे और राजस्व प्रशासन की प्रक्रियाएं प्रभावित होतीं।
अब आगे क्या होगा?
यह संवेदनशील मामला अब सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होगा। अंतिम निर्णय पर न केवल हिमाचल के किसानों और बागवानों का भविष्य निर्भर करेगा, बल्कि पूरे प्रदेश की भूमि राजस्व प्रणाली की दिशा भी तय होगी।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने फिलहाल अतिक्रमणकारियों, किसानों और बागवानों के लिए राहत की हवा बहा दी है, लेकिन अब सबकी निगाहें अंतिम सुनवाई और अंतिम फैसले पर टिकी हैं।