खत्म हो रहे हिमालयन कस्तूरी मृग: RTI में खुलासा, प्रजनन कार्यक्रम पूरी तरह नाकाम
भारत में हिमालयन कस्तूरी मृगों को बचाने के लिए चलाए गए प्रजनन कार्यक्रम पूरी तरह असफल साबित हुए हैं। हाल ही में सामने आई एक RTI में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि चिड़ियाघरों और प्रजनन केंद्रों में वर्षों से किए गए प्रयासों के बावजूद इस प्रजाति की संख्या नहीं बढ़ पाई है। हिमालयन कस्तूरी मृग अपनी खास खुशबू के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं, लेकिन अब ये विलुप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षण योजनाओं में गंभीर खामियां रहीं और कई बार इनकी सही पहचान भी नहीं की जा सकी।
हिमालय क्षेत्र में दो प्रमुख प्रजातियों के कस्तूरी मृग पाए जाते हैं – अल्पाइन कस्तूरी मृग (Moschus chrysogaster) जो मध्य से पूर्वी हिमालय में पाया जाता है और हिमालयन कस्तूरी मृग (Moschus leucogaster) जो उत्तर-पश्चिमी हिमालय का मूल निवासी है। लेकिन संरक्षण कार्यक्रमों में अक्सर इन दोनों प्रजातियों की पहचान गलत हो गई, जिससे प्रजनन की प्रक्रिया प्रभावित हुई। उत्तराखंड के चोपता में 1982 में पहला प्रजनन केंद्र खोला गया था। शुरुआत में वहां 5 मृग लाए गए और संख्या बढ़कर 28 तक पहुंच गई थी, लेकिन बीमारी, सांप के काटने और निमोनिया जैसी समस्याओं के कारण मृग लगातार मरते रहे और अंततः यह प्रयास भी विफल हो गया।
वन्यजीव संस्थान देहरादून के रिटायर्ड प्रोफेसर बीसी चौधरी का कहना है कि भारत में कस्तूरी मृग का संरक्षण कार्यक्रम पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। गलत रणनीतियों और पहचान की त्रुटियों ने इसे और भी जटिल बना दिया है। यही कारण है कि आज भी इस प्रजाति की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।
RTI से यह भी पता चला कि केवल कस्तूरी मृग ही नहीं, बल्कि कई अन्य संकटग्रस्त जीवों के प्रजनन और संरक्षण कार्यक्रम भी अधूरे रह गए या असफल हो गए हैं। इनमें तिब्बती मृग, नीलगिरी टार, गंगा डॉल्फिन, जंगली जल भैंसा और पिग्मी हॉग जैसी प्रजातियां शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अब भी मजबूत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में हिमालयन कस्तूरी मृग सहित कई अन्य दुर्लभ प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच सकती हैं।