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अमेरिका के मित्र देश क्यों देने लगे फिलिस्तीन को मान्यता, संयुक्त राष्ट्र में अब भी अधूरी सदस्यता

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अमेरिका के मित्र देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता देने का फैसला लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और पुर्तगाल ने हाल ही में फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी है। इससे पहले बेल्जियम, फ्रांस और कई यूरोपीय देश ऐसा कर चुके हैं। जबकि फिलिस्तीन ने 1988 में ही खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था, लेकिन 2025 तक उसे संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता नहीं मिल पाई है। सवाल उठता है कि इतने सालों बाद अचानक अमेरिका के करीबी देश फिलिस्तीन के समर्थन में क्यों खड़े हो गए हैं।

दरअसल, 1948 में इजरायल के गठन के साथ ही इस क्षेत्र में अस्थिरता शुरू हो गई थी। इजरायल को अमेरिका ने तुरंत मान्यता दी थी और उसके बाद से गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक में तनाव और हिंसा लगातार बनी रही। फिलिस्तीन का मामला भी काफी उलझा हुआ है। वेस्ट बैंक में फतेह की सरकार चलती है, जबकि गाजा पट्टी 2007 से हमास के कब्जे में है। दोनों मिलकर फिलिस्तीन का हिस्सा तो हैं, लेकिन व्यवहारिक रूप से अलग-अलग शासन व्यवस्थाएं हैं। इसके अलावा पूर्वी यरूशलम पर भी इजरायल और फिलिस्तीन दोनों दावा करते हैं।

इसी बीच 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजरायल ने गाजा में सख्त सैन्य अभियान शुरू किया। इसके बाद से गाजा पट्टी पूरी तरह तबाही का शिकार हो गई है। यहां करीब 20 लाख की आबादी में अब तक 60 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। घर, स्कूल और अस्पताल बमबारी में तबाह हो गए हैं। लाखों लोग भूखमरी और विस्थापन का शिकार हैं। संयुक्त राष्ट्र समर्थित संस्थाओं ने गाजा को “मानव निर्मित अकाल” घोषित कर दिया है।

इसी मानवीय संकट के बीच यूरोपीय देशों पर अपनी जनता का दबाव बढ़ने लगा। फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में मुस्लिम आबादी यहूदियों से कई गुना अधिक है। ऐसे में नेताओं पर दबाव था कि वे फिलिस्तीन का समर्थन करें। यही कारण है कि इन देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता देकर इजरायल के खिलाफ एक प्रतीकात्मक संदेश दिया। हालांकि यह मान्यता सशर्त भी है, जिसमें हमास को शासन से बाहर रखने, बंधकों की रिहाई और क्षेत्र के विसैन्यीकरण जैसे बिंदु शामिल हैं।

मार्च 2025 तक संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 151 देश फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके हैं। आयरलैंड, नॉर्वे और स्पेन जैसे देश भी दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन कर रहे हैं। अमेरिका को छोड़कर 1993 से अब तक सभी राष्ट्रपति फिलिस्तीन-इजरायल विवाद में दो-राष्ट्र समाधान की वकालत करते आए हैं, लेकिन अमेरिका अब तक संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन की पूर्ण सदस्यता रोकता रहा है। अप्रैल 2024 में अमेरिका ने एक बार फिर सुरक्षा परिषद में इस प्रस्ताव को वीटो कर दिया।

वर्तमान में फिलिस्तीन का संयुक्त राष्ट्र में दर्जा नॉन-मेंबर ऑब्जर्वर स्टेट का है। इस दर्जे के तहत वह बैठकों में हिस्सा ले सकता है और भाषण दे सकता है, लेकिन वोटिंग अधिकार नहीं रखता। पूर्ण सदस्य बनने के लिए सुरक्षा परिषद से मंजूरी और महासभा में दो-तिहाई बहुमत जरूरी है। लेकिन अमेरिका और इजरायल का विरोध उसकी सबसे बड़ी रुकावट बना हुआ है।

यूरोपीय देशों की ताजा मान्यता फिलिस्तीन के लिए कूटनीतिक जीत जरूर है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में पूर्ण सदस्यता की उसकी राह अभी भी कठिन है। मानवीय संकट और जनता के दबाव ने यूरोप को यह कदम उठाने पर मजबूर किया है, जबकि अमेरिका अब भी इजरायल के साथ खड़ा है।

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