वरिष्ठ नागरिकों की पुकार: EPFO पेंशन बढ़ाने के लिए सरकार करे न्यायिक आयोग का गठन
हैदराबाद/19/10/2025
हैदराबाद — देशभर के लाखों ईपीएफओ (EPFO) पेंशनभोगियों ने सरकार से न्यूनतम पेंशन बढ़ाने की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि मौजूदा ₹1,000 की पेंशन वृद्धावस्था की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहद नाकाफी है। पेंशनभोगियों ने सरकार से अपील की है कि वह एक न्यायाधीश की अध्यक्षता में आयोग का गठन करे, जो कर्मचारी पेंशन योजना (EPS 1995) की वास्तविक स्थिति और पेंशन बढ़ाने की संभावनाओं की जांच करे।
वर्तमान में देश में करीब 81 लाख पेंशनभोगी ईपीएफ अधिनियम 1952 के तहत पेंशन प्राप्त कर रहे हैं, जिनमें से 78 लाख को ₹5,000 से कम और 58 लाख को ₹2,000 से भी कम पेंशन मिलती है। जबकि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्य सरकारें कल्याणकारी योजनाओं के तहत बुजुर्गों को ₹4,000 या उससे अधिक पेंशन दे रही हैं।
पेंशनभोगियों का तर्क है कि वे यह अधिकार भीख में नहीं मांग रहे, बल्कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान वेतन का एक हिस्सा त्यागकर एक मजबूत पेंशन फंड बनाने में योगदान दिया है। इसलिए, उन्हें पर्याप्त पेंशन मिलना उनका संवैधानिक अधिकार और सामाजिक न्याय का प्रश्न है।
सरकार के तर्क और वास्तविक स्थिति
सरकार तीन प्रमुख आधारों पर पेंशन बढ़ाने में असमर्थता जताती रही है—
निर्धारित अंशदान और लाभ प्रणाली (Defined Contribution & Benefit Scheme) — जिसके अनुसार पेंशन की सीमा तय है।
एक्चुरियल घाटा (Actuarial Deficit) — जिसमें कहा गया कि 31 मार्च 2019 तक फंड में कमी थी।
पे-एज-यू-गो मॉडल (PAYG System) — जिसमें वर्तमान कर्मचारियों के अंशदान से रिटायर पेंशनभोगियों को पेंशन दी जाती है।
लेकिन आंकड़े सरकार के इन दावों पर सवाल उठाते हैं। श्रम मंत्रालय के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक ईपीएफ पेंशन कोष में ₹9.92 लाख करोड़ से अधिक की राशि निवेशित है। वहीं, 2023-24 में पेंशन भुगतान मात्र ₹23,027 करोड़ था, जो कुल फंड का सिर्फ 2.59% है। इस अवधि में अर्जित ब्याज ही ₹58,668 करोड़ रहा, जो कुल पेंशन भुगतान से दोगुना से अधिक है।
विशेषज्ञों की राय: “घाटे की बात बेमानी”
विशेषज्ञों का कहना है कि जब हर वर्ष पेंशन फंड में ₹71,000 करोड़ से अधिक का योगदान आता है और खर्च सिर्फ ₹23,000 करोड़ होता है, तो “घाटे” का दावा पूरी तरह गलत है। 2023-24 में ही पेंशन फंड में ₹48,000 करोड़ से अधिक की अतिरिक्त वृद्धि दर्ज की गई थी।
“न्यूनतम पेंशन बढ़ाना संभव”
आंकड़ों के अनुसार, यदि सरकार न्यूनतम पेंशन को ₹1,000 से बढ़ाकर ₹5,000 प्रति माह कर दे, तो कुल अतिरिक्त बोझ लगभग ₹32,589 करोड़ का होगा — जो सरकार के विशाल पेंशन कोष और ब्याज आय के मुकाबले बहुत कम है।
यहां तक कि अगर न्यूनतम पेंशन ₹10,000 तक भी की जाए, तो भी यह राशि प्रबंधनीय है।
बढ़ती वरिष्ठ नागरिक आबादी के मद्देनज़र
2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या 10.4 करोड़ थी, जो 2050 तक बढ़कर 34.7 करोड़ होने का अनुमान है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे में वृद्धावस्था सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है, खासकर तब जब निजी क्षेत्र के अधिकांश कर्मचारी ईपीएफ के दायरे में आते हैं।
पेंशनभोगियों की अपील
वरिष्ठ नागरिकों ने केंद्र सरकार से निवेदन किया है कि—
न्यूनतम पेंशन राशि को तत्काल बढ़ाया जाए।
सभी ईपीएफ सदस्यों को बिना किसी वेतन सीमा के कवर किया जाए।
पेंशन को अंतिम वेतन के कम से कम आधे हिस्से तक बढ़ाया जाए।
और यदि कोई असहमति है, तो सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में आयोग गठित किया जाए, जो इस विषय पर निष्पक्ष जांच करे और व्यावहारिक समाधान सुझाए।
देश के वरिष्ठ नागरिकों का कहना है — “हमने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ हिस्सा इस राष्ट्र की सेवा में दिया है, अब हमारी बुढ़ापे की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य है, कृपा नहीं।”