हिमाचल में दीवाली पर बढ़ा शोर प्रदूषण, चंबा–रामपुर–कुल्लू में पटाखों का हल्ला सबसे तेज़, बोर्ड ने जताई चिंता
हिमाचल प्रदेश में दीवाली की जगमग रात इस बार पटाखों के शोर में डूब गई। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, 20 अक्तूबर की रात कई शहरों में ध्वनि प्रदूषण का स्तर अनुमेय सीमा से ऊपर पहुंच गया। रिपोर्ट में सामने आया है कि दीवाली से पहले और दीवाली के दिन के बीच शोर स्तर में 10 से 25 डेसिबल तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
सबसे ज्यादा शोर प्रदूषण चंबा, रामपुर बुशहर, ऊना और कुल्लू जिलों में पाया गया। आंकड़ों के अनुसार, चंबा में शोर स्तर 56.8 dB(A) से बढ़कर 78.1 dB(A) पहुंच गया, जबकि रामपुर बुशहर में यह 55.4 dB(A) से बढ़कर 77.3 dB(A) दर्ज हुआ। ऊना के रक्कड़ कॉलोनी क्षेत्र में 43.7 dB(A) से 73.9 dB(A) और कुल्लू के ढालपुर क्षेत्र में 60.4 dB(A) से 74.9 dB(A) तक का स्तर दर्ज किया गया। इन सभी क्षेत्रों में शोर स्तर अपने निर्धारित मानकों से अधिक रहा, जिससे यह स्पष्ट है कि पटाखों और वाहनों के कारण शोर प्रदूषण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
राजधानी शिमला के रिज क्षेत्र में शोर स्तर 64.9 dB(A) तक दर्ज हुआ, जो व्यावसायिक क्षेत्र की सीमा (65 dB) के भीतर रहा। परवाणू में यह 53.6 से बढ़कर 62.1 dB(A) तक पहुंचा। धर्मशाला और हमीरपुर में भी हल्की वृद्धि देखी गई, लेकिन स्थिति अपेक्षाकृत नियंत्रित रही।
विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार उच्च ध्वनि स्तर के संपर्क में रहने से मानसिक तनाव, नींद की कमी, सुनने की क्षमता में गिरावट और हृदय रोग जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि रिहायशी क्षेत्रों में शोर स्तर 60 dB(A) से ऊपर रहा, जो स्वीकृत सीमा 55 dB(A) से अधिक है और यह लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव डॉ. प्रवीन चंदर गुप्ता ने कहा कि “दीवाली खुशियों का पर्व है, लेकिन इसे पर्यावरण की जिम्मेदारी के साथ मनाना आवश्यक है। ग्रीन क्रैकर्स का उपयोग करें और अनावश्यक पटाखेबाज़ी से बचें।” उन्होंने बताया कि प्रशासन को त्योहारों, शादियों और अन्य आयोजनों में शोर नियंत्रण मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
उन्होंने कहा कि बोर्ड जनता के बीच जागरूकता फैलाने के लिए नियमित कार्यक्रम आयोजित करेगा, ताकि लोग ‘Lifestyle for Environment (LiFE)’ की भावना अपनाएं और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनें।
बोर्ड ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण में जन-सहयोग सबसे अहम है। यदि नागरिक स्वयं जिम्मेदारी से त्योहार मनाएं, तो शोर प्रदूषण को आसानी से कम किया जा सकता है। विशेषकर बच्चों को शुरुआत से ही “कम पटाखे, अधिक खुशियाँ” जैसी सोच के साथ जागरूक करना आवश्यक है।
यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि हिमाचल में दीवाली के दौरान शोर प्रदूषण अब एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बनता जा रहा है। प्रशासन और बोर्ड लगातार इसकी निगरानी में जुटे हैं, लेकिन स्थायी समाधान तभी संभव है जब हर नागरिक खुद आगे आए और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता दिखाए।