हिमाचल की बूढ़ी दिवाली: दिवाली से एक महीने बाद मनाया जाने वाला पारंपरिक पर्व
हिमाचल प्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों में दिवाली से लगभग एक महीने बाद ‘बूढ़ी दिवाली’ का त्योहार मनाया जाता है। इस परंपरा के तहत पटाखों की बजाय लोग मशाल जलाकर रात भर नृत्य और गीतों के साथ पर्व का जश्न मनाते हैं। जिला कुल्लू, मंडी, शिमला और सिरमौर के कई क्षेत्रों में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
इस पर्व को ‘बुड्ढी दयावड़ी’ भी कहा जाता है। यहाँ ‘दयावड़ी’ का अर्थ संघर्ष होता है। जबकि आम दिवाली कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष अमावस्या को मनाई जाती है, बूढ़ी दिवाली मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष अमावस्या को आयोजित की जाती है। स्थानीय निवासी और साहित्यकार बताते हैं कि इस पर्व के पीछे कई पौराणिक कहानियां जुड़ी हैं, जैसे राक्षस वृत्रासुर और देवताओं के बीच युद्ध या भगवान राम के अयोध्या लौटने की सूचना देर से पहुंचना।
कुल्लू जिले के आनी और निरमंड उपमंडलों तथा मंडी जिले के करसोग क्षेत्र में बूढ़ी दिवाली विशेष रूप से मनाई जाती है। लोग देवदार और चीड़ की लकड़ियों की मशालें जलाकर गांव की परिक्रमा करते हैं, ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हैं और स्थानीय व्यंजन तैयार कर मेहमानों का स्वागत करते हैं। पर्व के दौरान 3 से 7 दिन तक मेले, लोक नृत्य, गीत और रामायण, महाभारत, राजा बलि से जुड़ी कथाओं का मंचन भी होता है।
निरमंड में बूढ़ी दिवाली का आयोजन पहाड़ी काशी के रूप में विख्यात स्थल पर होता है। यहां भगवान परशुराम और उनके शिष्यों पर हमला करने वाले दैत्य का वध करने की खुशी में यह पर्व मनाया जाता है। इसके अलावा, राजा बलि की कथा और भगवान राम के अयोध्या लौटने की कहानी से भी पर्व की प्राचीन पौराणिक पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है। इस तरह, बूढ़ी दिवाली हिमाचल प्रदेश में सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का प्रतीक बनकर आज भी जीवित है।