सिर्फ 5 मिनट में तबाह हो गई सैकड़ों ज़िंदगियां:जब बागमती नदी ने पूरी ट्रेन को निगल लिया
800 से ज्यादा लोगों की मौत से दहला देश
भारत के रेल इतिहास की सबसे भीषण और दर्दनाक दुर्घटनाओं में से एक घटी थी 6 जून 1981 को, जब बिहार की बागमती नदी ने यात्रियों से खचाखच भरी एक ट्रेन को अपनी लहरों में समा लिया। यह हादसा न केवल भारत, बल्कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी ट्रेन त्रासदी के रूप में दर्ज हुआ। कुछ ही मिनटों में 800 से अधिक लोगों की जान चली गई और सैकड़ों लापता हो गए — यह वह क्षण था जिसने पूरे देश को हिला दिया था।
उस दिन 416 डाउन पैसेंजर ट्रेन, जो मानसी (धमारा पुल) से सहरसा की ओर जा रही थी, 1000 से अधिक यात्रियों को लेकर रवाना हुई थी। गर्मी और भीड़ के मौसम में यह ट्रेन ही लोगों की एकमात्र उम्मीद थी। ट्रेन के अंदर की जगह कम पड़ने पर यात्री छतों पर, दरवाज़ों पर और यहां तक कि इंजन के किनारों तक लटक कर सफर कर रहे थे। रास्ते में अचानक आंधी और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। जैसे ही ट्रेन बागमती नदी पर बने पुल नंबर 51 पर पहुंची, पटरियों पर फिसलन और तेज हवाओं के कारण ड्राइवर को इमरजेंसी ब्रेक लगाने पड़े — और यहीं से शुरू हुई एक ऐसी त्रासदी, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ कभी नहीं भूल सकेंगी।
तेज ब्रेक लगने से ट्रेन की नौ में से सात बोगियां पटरी से उतरकर सीधे नदी में जा गिरीं। देखते ही देखते पूरी ट्रेन गहरे पानी में समा गई। चारों ओर चीख-पुकार मच गई, यात्री जान बचाने के लिए तड़प रहे थे, लेकिन उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था। भीषण बारिश और तेज बहाव ने राहत कार्य को और मुश्किल बना दिया। जब तक गोताखोर मौके पर पहुंचे, तब तक नदी ने सैकड़ों ज़िंदगियां निगल ली थीं।
अधिकारियों के अनुसार 286 शव निकाले गए, जबकि स्थानीय अनुमान 800 से 2000 मौतों तक पहुंचे। कई शव कभी नहीं मिले। हादसे के असली कारणों पर आज भी रहस्य बना हुआ है। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि ट्रैक पर मवेशियों का झुंड आने से ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगाए, वहीं दूसरी थ्योरी के अनुसार यात्रियों द्वारा तूफ़ान से बचने के लिए दरवाज़े-खिड़कियां बंद करने से हवा का दबाव बढ़ा और ट्रेन असंतुलित होकर पुल तोड़ते हुए नदी में जा गिरी।
हादसे के बाद ड्राइवर और फायरमैन मौके से भाग गए, जिन्हें दो दिन बाद गिरफ्तार किया गया। उस समय यह हादसा रेलवे प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर गया था। 1981 का वह साल भारतीय रेल के लिए काला साबित हुआ — केवल नौ महीनों में ही 526 रेलगाड़ियां पटरी से उतरीं।
बागमती नदी का वह हादसा आज भी भारत के रेल इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय है — एक ऐसी त्रासदी, जिसने दिखा दिया कि सिर्फ पांच मिनट में किस तरह ज़िंदगी, उम्मीदें और परिवार सबकुछ मिट सकते हैं। बागमती नदी की यह त्रासदी आज भी लोगों के दिलों में उस सच्चाई की तरह दर्ज है, जब कुछ ही मिनटों में पूरी की पूरी ज़िंदगियां पानी में समा गईं और पीछे रह गईं बस यादें और आँसू।