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कुल्लू में फिर बुलाई गई देव संसद: 31 अक्टूबर को नग्गर में होगी ‘जगती’, देवी-देवताओं के आदेश से बढ़ी उत्सुकता

कुल्लू/27/10/2025

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हिमाचल प्रदेश की देव संस्कृति एक बार फिर चर्चा में है। कुल्लू घाटी के नग्गर क्षेत्र में 31 अक्टूबर को “जगती” यानी देव संसद का आयोजन किया जाएगा। इस आयोजन के लिए करीब 300 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजे गए हैं। खास बात यह है कि यह निर्णय कुल्लू की आराध्य देवी माता हिडिंबा के आदेश पर लिया गया है, जिन्होंने दशहरा उत्सव के दौरान देव समाज को संकट से बचाने के लिए जगती बुलाने का निर्देश दिया था।

क्या है ‘जगती’ और क्यों होती है इसका आयोजन

स्थानीय भाषा में “जगती” को देव संसद या धर्म संसद कहा जाता है। जब भी देव समाज या मानव समाज पर कोई संभावित संकट दिखाई देता है, तब देवी-देवता अपने गुर (प्रतिनिधि) के माध्यम से राजपरिवार को जगती बुलाने का आदेश देते हैं। इसमें अलग-अलग देवी-देवता अपने प्रतीक चिन्ह जैसे संगल, घंटी या निशान लेकर आते हैं और सामूहिक रूप से आने वाली परिस्थितियों पर विचार करते हैं। देव गुरुओं से पूछ के जरिए सवाल पूछे जाते हैं और देवता उनके माध्यम से जवाब देते हैं।

जगती का आयोजन कुल्लू की प्राचीन राजधानी नग्गर के “जगती पट मंदिर” में किया जाएगा। यह स्थान सदियों से देव निर्णयों का केंद्र माना जाता है, जहां से निकला आदेश न सिर्फ देवताओं बल्कि आम जनता के लिए भी अंतिम माना जाता है।

देवी-देवताओं के आदेश से बुलाई गई जगती

भगवान रघुनाथ के छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ने बताया कि दशहरा उत्सव के दौरान माता हिडिंबा ने नग्गर में जगती बुलाने का आदेश दिया। उनका कहना था कि आने वाले समय में प्रकृति या मानव समाज पर बड़ा संकट आ सकता है, इसलिए देवताओं को एक साथ मिलकर समाधान निकालना होगा। यही कारण है कि कुल्लू, लाहौल और मंडी के सराज क्षेत्र तक से देवता इस आयोजन में शामिल होंगे।

ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

साहित्यकार डॉ. सूरत ठाकुर के अनुसार, नग्गर स्थित “जगती पट” एक रहस्यमय शिला है, जिसे प्राचीन काल में देवी-देवताओं के आदेश पर स्थापित किया गया था। जब भी घाटी में कोई बड़ा संकट, महामारी या विवाद होता है, तब इस स्थान पर देव संसद लगती है और देवता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से निर्णय देते हैं। समय बीतने के बावजूद इस देव व्यवस्था की आस्था आज भी उतनी ही मजबूत है जितनी सदियों पहले थी।

कई बार झुक चुकी है सरकार

इतिहास गवाह है कि “जगती पट” से निकले आदेशों के आगे कई बार सरकारों को भी अपने फैसले बदलने पड़े हैं। वर्ष 2007 में स्की विलेज प्रोजेक्ट के विरोध में जब जगती बुलाई गई थी, तब देवताओं के विरोध के चलते राज्य सरकार को यह प्रोजेक्ट रद्द करना पड़ा था। इसी तरह 2014 में बलि प्रथा पर रोक को लेकर भी देव संसद में चर्चा हुई थी।

देव परंपरा की अद्भुत झलक

जगती का निमंत्रण राज परिवार की ओर से भेजा जाता है। भगवान रघुनाथ के छड़ीबरदार पहले पूजा करते हैं, फिर देवताओं के गुर से पूछ की जाती है। देवता अपने-अपने आदेश बताते हैं और सामूहिक रूप से एक निर्णय लिया जाता है, जिसे पूरी घाटी मानती है।

कुल्लू घाटी में इस तरह की जगती का आयोजन मुख्य रूप से तीन स्थानों पर होता है — भगवान रघुनाथ मंदिर, ढालपुर मैदान और नग्गर स्थित जगती पट मंदिर। इस बार का आयोजन नग्गर में होगा, जहां माता त्रिपुरा सुंदरी, देवता जमलू, पंजवीर देवता और माता हिडिंबा की प्रमुख भूमिका रहेगी।

स्थानीय निवासी सुरेश आचार्य के शब्दों में — “जगती सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता की पहचान है। यहां देवता और इंसान मिलकर निर्णय लेते हैं। यही कुल्लू की असली देव संस्कृति है।

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