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735 दिन, 17,640 घंटे और अब भी इंतज़ार… शिमला में दृष्टिबाधितों का संघर्ष जारी — सरकार की चुप्पी बनी सवाल

शिमला/29/10/2025

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शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के कालीबाड़ी मंदिर के समीप स्थित एक रेन शेल्टर में बीते 735 दिनों से दृष्टिबाधितों का धरना जारी है। 25 अक्टूबर 2023 से शुरू हुआ यह आंदोलन अब राज्य के इतिहास का दूसरा सबसे लंबा धरना बन चुका है। बर्फबारी, बारिश, ठंड और चिलचिलाती धूप — हर मुश्किल के बावजूद ये लोग न्याय की उम्मीद में बैठे हैं।

धरना स्थल की स्थिति अपने आप में संघर्ष की कहानी कहती है — नीचे सार्वजनिक शौचालय, बगल में बैंक, मंदिर और स्कूल, और चंद सौ मीटर दूर डीसी कार्यालय। वहीं मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का आवास और राज्य सचिवालय भी ज्यादा दूर नहीं, लेकिन इन दृष्टिबाधितों की आवाज़ अब तक सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच सकी।

मांगें पुरानी, जवाब नहीं

‘दृष्टिहीन जन संगठन’ के बैनर तले बैठे ये दिव्यांग बैकलॉग भर्ती और समय पर पेंशन की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार ने अब तक सिर्फ आश्वासन दिए, कार्रवाई नहीं। रामपुर के नंद लाल बताते हैं कि “सरकार दिव्यांगों के लिए योजनाओं की बात करती है, लेकिन पेंशन भी वक्त पर नहीं आती। हमें 1700 रुपये मासिक पेंशन दी जाती है, लेकिन कई बार यह तीन-तीन महीने बाद मिलती है। क्या हमारी भूख भी तीन महीने बाद लगती है?”

धरने पर बैठे जयवंत कुमार कहते हैं, “हम अंधे हैं, लेकिन सरकार तो अंधी नहीं है। दो साल से बैठे हैं, किसी मंत्री या अधिकारी ने आकर हाल नहीं पूछा। पर हमने उम्मीद नहीं छोड़ी है।”

1200 पद खाली, भर्ती पर चुप्पी

प्रदर्शनकारियों के अनुसार, राज्य के विभिन्न विभागों में दृष्टिबाधितों के लिए करीब 1200 पद खाली पड़े हैं, जबकि पूरे प्रदेश में उनकी संख्या लगभग 500 है। बावजूद इसके, सरकार ने इन पदों को भरने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

17,640 घंटे का संघर्ष और हौसले का सबूत

बरसात में रेन शेल्टर में पानी भर जाता है, सर्दियों में ठंड हड्डियाँ जमा देती है, पर इनका जज़्बा नहीं टूटा। संगठन के सदस्य खुद पैसे इकट्ठे कर खाना बनाते हैं, तिरपाल बदलते हैं और उम्मीद की रोशनी जलाए रखते हैं। इनका कहना है कि 2001 में भी उन्होंने 1197 दिनों तक आंदोलन किया था, जिससे कुछ सुधार हुए थे। इस बार भी वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

सरकार के लिए एक सवाल

राजधानी के बीचोंबीच चल रहा यह धरना अब सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि हिमाचल की सामाजिक संवेदना और प्रशासनिक निष्क्रियता का आईना बन गया है। सवाल यह है कि क्या सरकार इन 17,640 घंटों के संघर्ष की आवाज़ सुनेगी — या फिर ये दृष्टिबाधित यूँ ही “रोशनी की उम्मीद” में अंधकार से लड़ते रहेंगे?

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