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रामपुर में पहाड़ी दिवस की धूम — लोकगीत, नाटी और कविताओं में झलकी हिमाचल की जीवंत संस्कृति

रामपुर/01/11/2025

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हिमाचल प्रदेश की समृद्ध लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को समर्पित राज्य स्तरीय पहाड़ी दिवस का आयोजन आज रामपुर स्थित गोविंद बल्लभ पंत राजकीय महाविद्यालय में किया गया। भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में हिमाचल की लोक संस्कृति, लोकगीत, नाटी और कविता की ऐसी प्रस्तुति देखने को मिली, जिसने दर्शकों को अपनी जड़ों के करीब ला दिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विधायक एवं 7वें राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष नंदलाल ने की। दीप प्रज्वलन के साथ शुभारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि पहाड़ी दिवस हमारी पहचान, भाषा और विरासत का प्रतीक है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दें, क्योंकि हिमाचली विरासत हमारी अस्मिता की धरोहर है।

पहले सत्र में महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने बुशहरी नाटी की खूबसूरत प्रस्तुति दी। इसके बाद डॉ. विजय कुमार स्टोक्स ने “हिमाचल की लुप्त होती सांस्कृतिक विरासत” विषय पर प्रेरक व्याख्यान दिया। उन्होंने लोक वाद्यों, परंपरागत वेशभूषा, बोलियों और लोकगीतों पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. सूरत ठाकुर ने की।

दूसरे सत्र में कुल्लवी नाटी की ऊर्जा से भरपूर प्रस्तुति ने माहौल को पूरी तरह हिमाचली बना दिया। इसके बाद आयोजित पहाड़ी कवि सम्मेलन में प्रदेशभर से आए 40 से अधिक कवियों ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। सुरेंद्र मिन्हास, बाबूराम धीमान, पल्लवी, डॉ. राकेश कपूर, हीरालाल ठाकुर, कृष्ण चंद्र महादेवीया, शिवानी और अन्य कवियों की रचनाएँ खूब सराही गईं। सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार शक्ति चंद्र राणा ने की और पहाड़ी लेखन की संवेदनाओं पर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम में हिमाचल कला संस्कृति अकादमी द्वारा पुस्तक प्रदर्शनी तथा राज्य अभिलेखागार द्वारा दुर्लभ ऐतिहासिक अभिलेखों की प्रदर्शनी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। इन प्रदर्शनों ने दर्शकों को हिमाचल के इतिहास और साहित्य की विरासत से परिचित करवाया।

कार्यक्रम संचालन प्रथम सत्र में कुसुम संघाइक (उपनिदेशक, भाषा एवं संस्कृति विभाग) और द्वितीय सत्र में मदन हिमाचली ने किया। इस अवसर पर सुरेश राणा, मोहन ठाकुर और सुनीला ठाकुर सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

यह आयोजन हिमाचल की लोक संस्कृति को सिर्फ देखने का नहीं, बल्कि उसे महसूस करने का अवसर बन गया। पहाड़ी दिवस ने इस बात को फिर सिद्ध किया कि हिमाचल की सांस्कृतिक धरोहर सिर्फ पर्वतों की नहीं, बल्कि लोगों की आत्मा में बसती है।

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