हिमाचल पंचायत चुनाव पर गहराया संकट —आयोग ने चुनाव की तैयारियाँ तेज कीं
सरकार के री-ऑर्गेनाइजेशन कदम से उभरी अनिश्चितता
शिमला/02/11/2025
हिमाचल प्रदेश में पंचायत व नगर निकाय चुनाव को लेकर हालात उलझते जा रहे हैं। स्टेट इलेक्शन कमीशन जहां दिसंबर–जनवरी में चुनाव करवाने की दिशा में तैयारियाँ तेजी से आगे बढ़ा रहा है, वहीं सरकार द्वारा पंचायतों के पुनर्गठन (री-ऑर्गेनाइजेशन) की अचानक तेज हुई प्रक्रिया ने चुनावी समयसीमा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
चुनाव आयोग ने सभी जिलाधिकारियों (DC) को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे असिस्टेंट रिटर्निंग ऑफिसर, पोलिंग ऑफिसर, वाहनों की व्यवस्था, मीडिया सेल, कंट्रोल रूम और मतगणना स्थल की पहचान जैसे सभी जरूरी प्रबंध तुरंत पूरे करें। यह संकेत है कि आयोग अब चुनाव कार्यक्रम घोषित करने के अंतिम चरण में है।
इसी बीच पंचायतीराज विभाग ने सभी DC को नया पत्र जारी कर 15 दिनों के भीतर पंचायतों के री-ऑर्गेनाइजेशन के लंबित प्रस्तावों को परीक्षण कर निदेशालय को भेजने का आदेश दिया है। इस कदम ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। यदि पंचायतों का पुनर्गठन लागू होता है, तो सीमांकन बदलेंगे, वोटर लिस्ट में परिवर्तन करना होगा और आरक्षण रोस्टर भी दोबारा तैयार करना पड़ेगा। नियम के अनुसार आरक्षण रोस्टर चुनाव से 90 दिन पहले जारी होना चाहिए, जबकि अभी तक इसका अंतिम मसौदा तैयार नहीं हुआ है।
यह विवाद इसलिए भी अहम है क्योंकि प्रदेश की 3577 पंचायतों में इस साल प्रधान, उप-प्रधान, वार्ड मेंबर, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद के चुनाव होने हैं। साथ ही 73 नगर निकायों में भी मतदान प्रस्तावित है। कई जिलों में वोटर लिस्ट का काम अंतिम चरण में पहुँच चुका है, लेकिन यदि सीमांकन बदलता है तो पूरा प्रारूप फिर से बनाना पड़ेगा।
विपक्ष नेता जयराम ठाकुर ने सरकार पर आरोप लगाया है कि पंचायतों के री-ऑर्गेनाइजेशन को अंतिम समय पर उठाकर सरकार चुनाव से बचना चाहती है। वहीं, सरकार का कहना है कि लंबित प्रस्तावों को निपटाना आवश्यक है ताकि भविष्य में विवाद न हो और पंचायत ढांचा व्यवस्थित रहे।
इलेक्शन कमीशन 15 नवंबर के बाद किसी भी समय चुनाव तिथियों का ऐलान कर सकता है। ऐसे में दोनों पक्षों की अलग-अलग दिशा ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में तनाव पैदा कर दिया है। स्थिति स्पष्ट है—तैयारियाँ तेज हैं, लेकिन अनिश्चितता और गहरा रही है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि सरकार और चुनाव आयोग किस तरह तालमेल बैठाते हैं और क्या चुनाव समय पर हो पाएंगे।