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SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: अवैधता मिली तो पूरे भारत में पड़ेगा प्रभाव

suprme court

बिहार में मतदाता सूची के सत्यापन के लिए चल रही SIR (Special Summary Revision) प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि इसमें किसी भी प्रकार की अवैधता या नियमों का उल्लंघन पाया गया, तो यह पूरी प्रक्रिया रद्द की जा सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस निर्णय का असर केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशभर में लागू होगा। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ADR, Voter Guss और अन्य संगठनों द्वारा दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि SIR प्रक्रिया में चुनाव आयोग द्वारा तय की गई मान्य प्रक्रिया का पालन नहीं हो रहा है और कई वास्तविक नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर किया जा रहा है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि आयोग मनमाने ढंग से आधार कार्ड को पहचान पत्र के रूप में थोप रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है।

प्रशांत भूषण ने ADR की ओर से तर्क रखा कि चुनाव आयोग सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन कर रहा है, लेकिन खुद की प्रक्रियाओं का उल्लंघन कर रहा है। वंदना ग्रोवर ने Voter Guss की तरफ से कहा कि इस अवैध प्रक्रिया की सजा आम नागरिकों को क्यों भुगतनी पड़े। वहीं याचिकाकर्ता अभिनि उपाध्याय ने बताया कि केवल 30% दावों और आपत्तियों की एंट्री ही अपडेट हो पाई है, बाकी पर कोई प्रक्रिया नहीं हो रही। इस बीच यह भी सामने आया है कि अभी तक लगभग 65 लाख नागरिकों के आधार कार्ड को आयोग ने अमान्य माना है, और उन BLO अधिकारियों के खिलाफ नोटिस जारी किए जा रहे हैं जिन्होंने लोगों के आधार कार्ड को पहचान पत्र के रूप में स्वीकार किया। आयोग की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी और गोपाल शंकरणारायणन ने कोर्ट को बताया कि चुनाव आयोग पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन कर रहा है और आधार को केवल 12वां वैकल्पिक पहचान दस्तावेज माना गया है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत शर्मा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनाव आयोग को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा, “हम मानकर चलेंगे कि चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारी समझता है। लेकिन यदि SIR प्रक्रिया में अवैधता पाई गई, तो यह रद्द कर दी जाएगी, और यह फैसला केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा।” सुप्रीम कोर्ट का यह सख्त रुख चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ा सकता है क्योंकि यह मामला अब केवल एक राज्य की मतदाता सूची तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर मतदाता पंजीकरण की पारदर्शिता और वैधता पर सवाल खड़े कर रहा है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ वही नागरिक वोट देने के हकदार होंगे जो वास्तव में भारतीय नागरिक हैं, और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बनाए गए मतदाता सूची के नामों को हटाया जाएगा।

अब इस मामले में अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी, जिसमें चुनाव आयोग को विस्तार से रिपोर्ट सौंपनी होगी कि SIR प्रक्रिया को लेकर क्या कदम उठाए गए हैं और अवैधताओं को कैसे सुधारा गया है। कोर्ट का यह स्पष्ट रुख बताता है कि देशभर में मतदाता सूची की प्रक्रिया को लेकर अब पारदर्शिता और जिम्मेदारी से समझौता नहीं किया जाएगा।

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