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कृत्रिम बुद्धिमत्ता: भारत के भ्रष्टाचार के खिलाफ नई उम्मीद या सिर्फ़ एक डिजिटल सपना

हैदराबाद/17/10/2025

kritrim

हैदराबाद, अक्टूबर 2025 — भारत में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि यह न केवल सरकारी तंत्र बल्कि आम जनता के विश्वास को भी खोखला कर चुकी हैं। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2024 के अनुसार, भारत 180 देशों में 93वें स्थान पर है। यह स्थिति इस ओर इशारा करती है कि सुधार के प्रयासों के बावजूद, रिश्वतखोरी और संसाधनों के दुरुपयोग जैसी प्रवृत्तियाँ अब भी देश के विकास की रफ्तार को रोक रही हैं।

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भ्रष्टाचार भारत को हर वर्ष सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3% नुकसान पहुंचाता है, जबकि ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी के 2019 के अनुमान के अनुसार भारत को पिछले दशक में 83 अरब डॉलर का नुकसान अवैध वित्तीय लेन-देन से हुआ। 2023 के एक सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि 10 में से 7 भारतीयों को किसी न किसी बुनियादी सेवा के लिए रिश्वत देनी पड़ी या जान-पहचान का सहारा लेना पड़ा।

यह स्पष्ट करता है कि भ्रष्टाचार सिर्फ़ “ऊँचे स्तर के घोटालों” की बात नहीं है — यह लोगों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है। राज्य स्तर पर व्यापम घोटाला, अवैध खनन, शिक्षक भर्ती और मनरेगा भुगतान में फर्जीवाड़ा जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि समस्या स्थानीय स्तर पर और भी गंभीर है।

इसी बीच, अल्बानिया ने सितंबर 2025 में दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा जब उसने पहली बार एक एआई कैबिनेट मंत्री — “डिएला” — की नियुक्ति की। यह कोई इंसान नहीं, बल्कि एक डिजिटल इकाई है जो शासन व्यवस्था से सीधे जुड़ी है और निविदाओं व अनुबंधों की पारदर्शिता पर नज़र रखती है। अल्बानिया के प्रधानमंत्री ने इसे “100% भ्रष्टाचार-मुक्त सार्वजनिक अनुबंधों” की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया।

इस निर्णय ने भारत के सामने बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है — क्या 1.4 अरब की आबादी वाला भारत भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सहारे अपने “पुराने दुश्मन” को हरा सकता है? भारत हर साल अपने GDP का करीब 22% सार्वजनिक खरीद पर खर्च करता है। ऐसे में अगर तकनीक के माध्यम से पारदर्शिता लाई जाए तो अरबों रुपये की बचत संभव है। भारत के पास पहले से ही आधार, जीएसटी नेटवर्क, यूपीआई, ई-प्रोक्योरमेंट सिस्टम जैसी डिजिटल नींव मौजूद हैं। जरूरत है इन्हें एक स्मार्ट इंजन से जोड़ने की, जो वास्तविक समय में अनियमितताओं का पता लगा सके। संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय (UNODC) के अनुसार, एआई और बिग डेटा एनालिटिक्स “ऐसे संदिग्ध पैटर्न पहचानने में सक्षम हैं जिन्हें इंसानी ऑडिटर कभी नहीं पकड़ पाते।”

यदि भारत एआई आधारित भ्रष्टाचार-रोधी प्रणाली लागू करता है, तो यह कुछ प्रमुख क्षेत्रों में बदलाव ला सकती है —

टेंडर वॉचडॉग: सरकारी निविदाओं में मिलीभगत और बार-बार जीतने वाले समूहों की पहचान।

वेलफेयर गार्जियन: फर्जी लाभार्थियों और डुप्लिकेट डेटा की पहचान।

टैक्स फ्रॉड डिटेक्टर: नकली कंपनियों और फर्जी चालानों का पता लगाना।

सिटीजन डैशबोर्ड: जनता को पारदर्शी आंकड़े और रिपोर्ट्स उपलब्ध कराना।

विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, एआई आधारित पारदर्शी प्रणालियों से सरकारी खरीद में 30% तक नुकसान कम किया जा सकता है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने भी ऐसी प्रणालियों को “भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान को दंडात्मक कार्रवाई से रोकथाम की दिशा में ले जाने वाला” कदम बताया है।

हालाँकि, विशेषज्ञों की राय में एआई कोई जादू की छड़ी नहीं है। गलत डेटा या पूर्वाग्रहपूर्ण एल्गोरिद्म इसके परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए इस तकनीक के साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति, नागरिक निगरानी और पारदर्शिता भी जरूरी है।

भारत ने पहले ही डिजिटल क्रांति के ज़रिए दुनिया को दिखा दिया है कि परिवर्तन संभव है — UPI ने भुगतान प्रणाली को बदल दिया, आधार ने कल्याणकारी योजनाओं को पारदर्शी बनाया, और अब भ्रष्टाचार से लड़ाई में एआई भारत का सबसे बड़ा सहयोगी बन सकता है।

अब सवाल सिर्फ इतना है — क्या भारत वह साहसिक कदम उठाएगा, जो अल्बानिया ने उठाया? अगर हाँ, तो शायद आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत की नई भ्रष्टाचार-विरोधी योद्धा बन जाए। क्योंकि कार्रवाई का सही समय — अभी है।

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