सीटू ने सरकार की अधिसूचना को बताया कर्मचारी विरोधी, निरस्त करने की मांग
शिमला। सीटू राज्य कमेटी हिमाचल प्रदेश ने 6 सितम्बर 2025 को जारी अधिसूचना को कर्मचारी विरोधी करार देते हुए कहा है कि यह हजारों कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों पर हमला है। संगठन ने मांग की है कि अधिसूचना को तुरंत निरस्त किया जाए और प्रदेश की 89 श्रेणियों के कर्मचारियों के आर्थिक लाभों को पूर्ववत बहाल किया जाए।
सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा और महासचिव प्रेम गौतम ने कहा कि इस अधिसूचना से हजारों कर्मचारियों को प्रतिमाह 10 से 15 हजार रुपये तक का नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) का उल्लंघन करते हुए सरकार कर्मचारियों को उनके वैध आर्थिक लाभों से वंचित कर रही है।
नेताओं ने कहा कि न्यायालयों के अनेक निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि कर्मचारियों को मिल रहे आर्थिक लाभों में कटौती नहीं की जा सकती। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय भी पहले आदेश दे चुका है कि सभी कर्मचारियों को समान वेतन और लाभ मिलना चाहिए। ऐसे में सरकार का यह निर्णय न केवल कर्मचारी विरोधी है बल्कि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना भी है।
सीटू नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार ने नियमित कर्मचारियों की जगह कॉन्ट्रैक्ट नियुक्तियां कर संविदा श्रम (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम 1970 का उल्लंघन किया है और अब उन्हीं कर्मचारियों के आर्थिक अधिकारों पर कुठाराघात किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि सरकार बड़े अधिकारियों, पुनर्नियुक्ति अधिकारियों और बोर्डों-निगमों के नामित निदेशकों पर तो खजाना लुटा रही है, लेकिन कर्मचारियों, किसानों और मजदूरों को आर्थिक संकट का हवाला देकर ठगा जा रहा है। यह सरकार की दोहरी नीति और नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू करने की मानसिकता को उजागर करता है।
सीटू नेताओं ने कहा कि ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) कर्मचारियों ने अपने संघर्ष से हासिल की है, यह सरकार की मेहरबानी नहीं है। उन्होंने सरकार से मांग की कि OPS का श्रेय लेना बंद करे और निगमों-बोर्डों के कर्मचारियों को भी OPS लागू करके समानता सुनिश्चित करे।
सीटू ने प्रदेश की सभी कर्मचारी यूनियनों से अपील की है कि वे मिलकर सरकार की नवउदारवादी व कर्मचारी विरोधी नीतियों के खिलाफ निर्णायक संघर्ष छेड़ें।