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गया का अंधेरा गांव: आज़ादी के 77 साल बाद भी नहीं आई बिजली

लोग तीन किलोमीटर दूर चलकर चार्ज करते हैं मोबाइल

बिहार/11/10/2025

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बिहार के गया जिले का शिवपुर गांव आज भी विकास की रौशनी से कोसों दूर है। आज़ादी के 77 साल बाद भी इस गांव में न तो बिजली की सुविधा है, न ही सड़क या साफ पानी का इंतज़ाम। गांव के लोग अपने मोबाइल चार्ज करने के लिए तीन किलोमीटर पैदल चलकर दूसरे गांव जाते हैं। करीब 100 घरों में रहने वाले तीन सौ से अधिक लोगों का जीवन आज भी मिट्टी के चूल्हे, अंधेरी रातों और गड्ढों के पानी पर निर्भर है। यहां ज्यादातर लोग मांझी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें अब तक उज्ज्वला योजना का लाभ तक नहीं मिला।

शिवपुर गांव मोहनपुर प्रखंड के अंबा तरी पंचायत के वार्ड संख्या 12 में आता है। इस पंचायत में कुल 15 वार्ड हैं, लेकिन शिवपुर, सिंधुगढ़, कुंज भवन टोला, देंधुआ टांड और कदरचूआ टोला जैसे कई इलाकों में अब तक बिजली के तार नहीं खिंचे। कई जगहों पर खंभे तो लगे हैं, मगर ट्रांसफार्मर तक नहीं। कुछ गांवों में पांच साल से खंभे गड़े हैं, लेकिन आज तक वहां बिजली की एक भी किरण नहीं पहुंची।

यहां की स्थानीय निवासी मुन्नी देवी बताती हैं कि वह रोज़ाना लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती हैं क्योंकि गैस सिलेंडर लेना उनके बस की बात नहीं। “हम गरीब लोग हैं, उज्ज्वला योजना का लाभ नहीं मिला, गैस खरीदने के पैसे नहीं हैं। जंगल से लकड़ी लाते हैं और उसी से खाना बनाते हैं,” उन्होंने कहा।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि चुनाव के वक्त नेता यहां आते हैं, वोट मांगते हैं और बड़े-बड़े वादे करते हैं,  डर दिखाकर वोट ले लेते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद कोई लौटकर नहीं आता। वार्ड सचिवों ने भी जातिगत राजनीति और प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल उठाए हैं।

पंचायत प्रतिनिधि अजमत अली का कहना है कि कई टोले वन विभाग की भूमि पर बसे हैं, जिसकी वजह से बिजली कनेक्शन में दिक्कत आती है। वहीं गांव के विकास मांझी कहते हैं कि “हमारे पूर्वज यहां 60 के दशक से रह रहे हैं, अगर जमीन का मसला है तो हमें दूसरी जगह बसाने की जिम्मेदारी भी सरकार की है। वोट लेने में नेताओं को तो कोई दिक्कत नहीं होती, फिर सुविधा देने में क्यों?”

यह स्थिति सिर्फ शिवपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि गया जिले के कई गांव इसी तरह अंधेरे में जीने को मजबूर हैं। ऐसे समय में जब बिहार सरकार 125 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने की बात करती है, तब भी शिवपुर जैसे गांव आज तक बल्ब की रोशनी नहीं देख पाए हैं। यह न सिर्फ व्यवस्था की विफलता है बल्कि विकास के दावों पर करारा तमाचा भी।

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