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हिमाचल हाईकोर्ट का फैसला: बच्चों के वयस्क होने पर पिता भरण-पोषण भत्ता वापस नहीं मांग सकते

शिमला/07/10/2025

highy court

शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि पिता अपने बच्चों के वयस्क होने के बाद उन्हें दिए गए भरण-पोषण भत्ते की वापसी की मांग नहीं कर सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों की शिक्षा और पालन-पोषण के लिए पिता का समर्थन उनका नैतिक कर्तव्य है। यह टिप्पणी न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने की। अदालत ने कहा कि वयस्क होने के बाद भले ही पिता का कोई कानूनी दायित्व न हो, लेकिन नैतिक दृष्टि से उनका कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों का पालन-पोषण सुनिश्चित करें, खासकर जब बच्चे अपनी शिक्षा पूरी करने के कगार पर हों।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट मंडी के याचिकाकर्ता के दावे को खारिज किया, लेकिन दूसरे याचिकाकर्ता को वयस्क होने तक बढ़ा हुआ भरण-पोषण पाने का अधिकार दिया। फैमिली कोर्ट के अनुसार, सीआरपीसी की धारा 125 असमर्थ पत्नी, नाबालिग बच्चे या वयस्क बच्चे को भरण-पोषण का अधिकार देती है। इसलिए बच्चे केवल वयस्क होने तक भरण-पोषण के हकदार होते हैं। वयस्क होने के बाद केवल वही बच्चा भरण-पोषण पा सकता है जो शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ हो। अदालत ने यह भी दोहराया कि हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम अविवाहित बेटियों को भरण-पोषण का दावा करने की अनुमति देता है, जबकि सीआरपीसी की धारा 125 अविवाहित वयस्क बेटियों को कवर नहीं करती।

इस मामले में याचिकाकर्ता के बच्चे 2016 और 2020 में वयस्क हो चुके थे। उन्होंने दावा किया कि आर्थिक तंगी उनकी पढ़ाई में बाधा डाल सकती है। 2012 में न्यायिक मजिस्ट्रेट ने प्रत्येक को 2 हजार प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया। 2015 में इसे बढ़ाकर 3 हजार, 2017 में 4 हजार और 2018 में और वृद्धि की मांग की गई। फैमिली कोर्ट ने पत्नी के भरण-पोषण के लिए 8 हजार स्वीकृत किए, लेकिन बच्चों के दावे को खारिज कर दिया।

प्रतिवादी पिता ने बच्चों के वयस्क होने पर भरण-पोषण राशि वापस लेने की दलील दी थी, जिसे हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया।

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