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हिमाचल पंचायत चुनाव पर संशय: पुनर्गठन के फैसले से अटकी तैयारी, हाईकोर्ट तक जा सकता मामला

शिमला/26/10/2025

panchayat

शिमला। हिमाचल प्रदेश में प्रस्तावित पंचायत चुनाव अब कानूनी पेचीदगियों में उलझते नजर आ रहे हैं। सरकार द्वारा पंचायतों के पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन का फैसला लेने से तय समय पर चुनाव करवाना मुश्किल हो गया है। राज्य चुनाव आयोग (State Election Commission) इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दे सकता है, क्योंकि पंचायत चुनाव समय पर करवाना संवैधानिक बाध्यता है।

आयोग की महीनों की मेहनत पर पड़ सकता है असर

राज्य चुनाव आयोग पिछले तीन से चार महीनों से पंचायत चुनाव की तैयारियों में जुटा हुआ था। सूत्र बताते हैं कि अब तक 3 करोड़ पोस्टल बैलेट छप चुके हैं, और सारी चुनाव सामग्री जिलों के उपायुक्तों (DCs) को भी भेजी जा चुकी है। वोटर लिस्ट का फाइनल ड्राफ्ट 13 नवंबर को जारी होना था, जिसके बाद कभी भी चुनाव की अधिसूचना जारी की जा सकती थी। लेकिन अब कैबिनेट के निर्णय के बाद पूरा चुनावी शेड्यूल अनिश्चित हो गया है।

पुनर्गठन से टल सकता है चुनावी शेड्यूल

सरकार के इस फैसले के बाद अगर पंचायतों का पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन होता है, तो नई वोटर लिस्ट तैयार करनी पड़ेगी। इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम ढाई से तीन महीने का समय लगेगा। साथ ही, नई ग्राम सभा बैठकें, आपत्तियां आमंत्रित करने और अंतिम सूची तैयार करने की प्रक्रिया दोबारा से करनी होगी।

पंचायतीराज मंत्री के दावे पर उठे सवाल

राज्य के पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह का कहना है कि पुनर्गठन के बावजूद चुनाव तय समय पर होंगे। हालांकि, चुनावी विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक और तकनीकी दृष्टि से यह लगभग असंभव है। चुनाव आयोग पहले ही सरकार को समय से पुनर्गठन का काम पूरा करने की सलाह दे चुका था, लेकिन अब देर से लिया गया निर्णय पूरी तैयारी पर “ब्रेक” लगाता नजर आ रहा है।

संवैधानिक बाध्यता: 23 जनवरी से पहले चुनाव अनिवार्य

प्रदेश की सभी 3577 पंचायतों का कार्यकाल 23 जनवरी 2026 तक पूरा हो जाएगा। ऐसे में 23 जनवरी से पहले चुनाव करवाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है। चुनाव में प्रधान, उप-प्रधान, वार्ड सदस्य, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य चुने जाने हैं।

आयोग की प्रतिक्रिया पर सबकी निगाहें

स्टेट इलेक्शन कमिश्नर अनिल खाची ने कहा कि सरकार के निर्णय का अध्ययन करने के बाद ही आगे की कार्रवाई या प्रतिक्रिया दी जाएगी। माना जा रहा है कि आयोग इस फैसले को लेकर जल्द ही कानूनी सलाह लेगा और स्थिति स्पष्ट करेगा।

विपक्ष का आरोप – “सरकार चुनाव से भाग रही”

वहीं, विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि हार के डर से सरकार चुनाव टालने का रास्ता खोज रही है। विपक्ष का कहना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में देरी जनता के अधिकारों का हनन है।

अब सभी की नजरें इस पर हैं कि क्या चुनाव आयोग हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएगा या सरकार कोई वैकल्पिक रास्ता निकालेगी। आने वाले कुछ दिन पंचायत राजनीति के भविष्य का रुख तय कर सकते हैं।

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