हिमालयी राज्यों में तबाही: प्राकृतिक आपदाएँ या चीन की मौसम से छेड़छाड़
हिमालयी राज्यों में हाल के दिनों में आई प्राकृतिक आपदाओं ने भारी तबाही मचाई है। उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोत्तर राज्यों में लगातार बादल फटने, बाढ़, भूस्खलन और असामान्य बारिश की घटनाओं से आमजन का जीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है। इन घटनाओं को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर क्यों ये आपदाएँ सिर्फ चुनिंदा राज्यों में इतनी तबाही मचा रही हैं। क्या इसके पीछे सिर्फ प्राकृतिक कारण हैं या फिर चीन की वेदर मॉडिफिकेशन तकनीक का असर भी पड़ रहा है? इसी आशंका को देखते हुए अब रक्षा मंत्रालय भी इस पूरे मामले पर पैनी नज़र रख रहा है।
चीन लंबे समय से मौसम को नियंत्रित करने की तकनीक पर काम कर रहा है। जानकारी के अनुसार, चीन ने 1949 से वेदर मॉडिफिकेशन प्रोग्राम शुरू किया था और धीरे-धीरे इसे बड़े पैमाने पर फैलाया। 2020 में चीन ने दावा किया था कि वह 2025 तक 55 लाख वर्ग किलोमीटर तक मौसम को नियंत्रित करने की क्षमता हासिल कर लेगा। चीन ने कई बार खुले तौर पर यह स्वीकार किया है कि वह कृत्रिम बारिश कराने की तकनीक पर काम कर रहा है और क्लाउड सीडिंग के जरिए अपने यहां सूखे को रोकने व कृषि उत्पादन बढ़ाने का प्रयास करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाए, तो यह पड़ोसी देशों के मौसम पर भी असर डाल सकती है।
भारत में इस समय भारी तबाही का आलम है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कई इलाकों में घर जमींदोज हो गए हैं, पुल और सड़कें बह गई हैं और भूस्खलन की वजह से गाँव के गाँव खतरे में हैं। लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए बचाव दल दिन-रात राहत कार्यों में जुटे हुए हैं। आपदा प्रबंधन की टीमें लगातार काम कर रही हैं, फिर भी हालात काबू में नहीं आ पा रहे।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की तकनीक सिर्फ अपने देश में ही नहीं बल्कि पड़ोसी देशों में भी मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि भारत में उठती आपदाओं और अचानक हो रहे मौसम बदलावों को लेकर संदेह गहराता जा रहा है। सवाल यह भी है कि यदि चीन वास्तव में मौसम से छेड़छाड़ कर रहा है, तो इसका असर आने वाले समय में और भी खतरनाक हो सकता है।
भारत के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती है। एक तरफ प्राकृतिक आपदाएँ लगातार जनजीवन को नुकसान पहुँचा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ यह शंका गहराती जा रही है कि कहीं चीन की कृत्रिम बारिश और मौसम नियंत्रण परियोजनाएँ भारत के लिए नई मुश्किलें तो खड़ी नहीं कर रही हैं। रक्षा मंत्रालय ने इस पूरे मामले पर बारीकी से निगरानी शुरू कर दी है।