भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों में आत्महत्याओं का बढ़ता संकट: भेदभाव, दबाव और सिस्टम की खामियां बनी जानलेवा
हैदराबाद/12/10/2025
भारत के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों — आईआईटी, आईआईएम, मेडिकल कॉलेज और केंद्रीय विश्वविद्यालयों — में छात्रों की आत्महत्याओं का ग्राफ चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है। बीते दो दशकों में केवल आईआईटी कैंपसों में ही 115 छात्रों ने अपनी जान ले ली, जिनमें से सबसे अधिक घटनाएं आईआईटी मद्रास से सामने आई हैं। सवाल उठता है कि आखिर भारत के ये संस्थान, जिन्हें ज्ञान और नवाचार की प्रयोगशाला कहा जाता है, अब अवसाद और भेदभाव के केंद्र क्यों बन रहे हैं?
आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र धीरज सिंह द्वारा दाखिल एक आरटीआई के जवाब में खुलासा हुआ कि 2005 से 2024 के बीच 115 आत्महत्याएं हुईं, जिनमें से 98 कैंपस के अंदर हुईं। आईआईटी मद्रास में 26, आईआईटी कानपुर में 18, आईआईटी खड़गपुर में 13 और आईआईटी बॉम्बे में 10 मौतें दर्ज की गईं। ये आंकड़े बताते हैं कि शैक्षणिक दबाव, जातिगत भेदभाव और मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी छात्रों पर भारी पड़ रही है।
2016 में रोहित वेमुला की आत्महत्या और 2019 में डॉ. पायल तड़वी की मौत ने यह साबित किया कि संस्थागत भेदभाव अब भी गहराई से मौजूद है। थोराट समिति की 2007 की रिपोर्ट में सामने आया कि एम्स दिल्ली में 72% एससी/एसटी छात्रों ने भेदभाव झेला, जबकि 85% ने कहा कि उन्हें परीक्षा या कक्षा में समान अवसर नहीं मिला। इन अनुभवों ने हाशिए पर खड़े छात्रों में गहरी हीनभावना और अवसाद को जन्म दिया, जिससे कई छात्रों ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया।
केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी के 80%, एसटी के 83% और एससी के 64% फैकल्टी पद खाली हैं। इस असंतुलन से संस्थानों में एक प्रभुत्वशाली संस्कृति विकसित हुई है, जहां वंचित वर्गों के छात्र खुद को अलग-थलग और असुरक्षित महसूस करते हैं।
भारत के कई इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों में काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता या खुली बातचीत की व्यवस्था बेहद सीमित है। आईआईटी-खड़गपुर ने हाल ही में “सेतु (Support, Empathy, Transformation, Upliftment)” कार्यक्रम की शुरुआत की है, जिसमें एआई-आधारित भावनात्मक स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली शामिल है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं हैं — संस्थागत संवेदनशीलता और सहानुभूति की संस्कृति भी जरूरी है।
भारत सरकार ने राष्ट्रीय टेली-मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NTMHP) और “मनो दर्पण” पहल शुरू की है, ताकि छात्रों को मानसिक परामर्श और सहायता उपलब्ध हो सके। इसके अलावा, 2022 में शुरू की गई राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति का लक्ष्य 2030 तक आत्महत्या दर में 10% की कमी लाना है। लेकिन आलोचकों के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य पर सरकार का निवेश बेहद कम है — कुल स्वास्थ्य बजट का केवल 1.05% मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट वर्तमान में एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है जिसमें “रोहित अधिनियम” लागू करने की मांग की गई है। यह अधिनियम संस्थागत भेदभाव को रोकने और विश्वविद्यालयों में जवाबदेही तय करने के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करेगा।
भारत के उच्च शिक्षण संस्थान आज भी ‘मेरिट बनाम आरक्षण’ की बहस में उलझे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि छात्रों की मानसिक, सामाजिक और आर्थिक जरूरतों को समझने में संस्थान विफल रहे हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल अकादमिक सफलता नहीं, बल्कि मानवता, समानता और संवेदनशीलता को भी बढ़ावा देना होना चाहिए।
नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी रचना गीतांजलि में लिखा था — “जहां मन भय से मुक्त हो, वही सच्चा राष्ट्र है।” जरूरत है ऐसे ही संस्थागत वातावरण की, जहां छात्र भय और भेदभाव से मुक्त होकर सीख सकें, सोच सकें और समाज के निर्माण में भागीदार बन सकें।