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बड़ी आंत तक आसानी से पहुंचेगी दवाई, क्वेरसेटिन से कैंसर का इलाज संभव

palampur

पालमपुर। गंभीर बीमारियों खासकर कोलन (बड़ी आंत) कैंसर के इलाज के लिए आईएचबीटी (CSIR-इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी) पालमपुर के शोधार्थियों ने नई तकनीक विकसित की है। यह तकनीक पौधों से प्राप्त तत्व क्वेरसेटिन को बिना प्रभावित हुए सीधा कोलन तक पहुंचाने में मदद करेगी। इससे मरीजों को अब कीमोथैरेपी में इस्तेमाल होने वाली सिंथेटिक दवाओं के दुष्प्रभावों से बड़ी राहत मिलेगी।

कीमोथैरेपी से राहत की उम्मीद
अब तक कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में सिंथेटिक दवाओं का उपयोग किया जाता रहा है। इससे मरीजों में बाल झड़ना, रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना और अन्य अंगों पर बुरा असर जैसी समस्याएं सामने आती हैं। वहीं, क्वेरसेटिन जैसे प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट औषधीय गुणों से भरपूर हैं, लेकिन इन्हें बड़ी आंत तक पहुंचाना बेहद मुश्किल था।

आईएचबीटी के शोध की खासियत

आईएचबीटी पालमपुर के शोधार्थी नबाव खान ने क्वेरसेटिन को बड़ी आंत तक सुरक्षित पहुंचाने की तकनीक सुझाई है। उन्होंने इसे साइक्लोडेक्सट्रिन-आधारित नैनोफाइबर की मदद से विकसित किया है। यह नैनोफाइबर क्वेरसेटिन को पेट के अम्लीय वातावरण (pH 1.2) से बचाता है और सीधे बड़ी आंत (pH 7.0) तक पहुंचाता है।

इस शोध के परीक्षण में पाया गया कि पेट और छोटी आंत में क्वेरसेटिन की केवल 5% मात्रा ही रिलीज हुई, जबकि कोलन में यह आंकड़ा 81.9% तक पहुंच गया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली सराहना


नबाव खान ने इस शोध पत्र को NIT हमीरपुर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया, जहां इसे अमेरिकन केमिकल सोसायटी (ACS) द्वारा सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र चुना गया। यह शोध पहले ही जर्नल ऑफ मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर में प्रकाशित हो चुका है। दक्षिण अफ्रीका से आए विशेषज्ञों ने भी इस शोध को सराहा।

विशेषज्ञों की राय


सीएसआईआर-आईएचबीटी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अंकित सनेजा के मार्गदर्शन में यह शोध किया गया। उनका कहना है कि क्वेरसेटिन जैसे प्राकृतिक तत्व कैंसररोधी और सूजनरोधी प्रभाव रखते हैं। इस तकनीक से कोलन कैंसर, अल्सरेटिव कोलाइटिस और आंत की सूजन जैसी बीमारियों के इलाज में नई उम्मीद जगी है।

सुरक्षित और मान्यता प्राप्त तकनीक


इस तकनीक में जिस पॉलिमर का प्रयोग किया गया है, उसे अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (USFDA) से मान्यता प्राप्त है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में कैंसर मरीजों के इलाज में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।

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