केरल हाईकोर्ट ने केंद्र को लगाई फटकार: कहा– संविधान पढ़िए, वायनाड आपदा पीड़ितों के खिलाफ ऋण वसूली पर रोक
एर्नाकुलम/08/10/2025
एर्नाकुलम: केरल उच्च न्यायालय ने वायनाड आपदा पीड़ितों के ऋण माफी से जुड़े मामले में केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने केंद्र से कहा कि अगर लोगों की मदद करने की मंशा नहीं है, तो खुले तौर पर बता दें, और साथ ही संविधान को दोबारा पढ़ने की सलाह दी।
दरअसल, वायनाड भूस्खलन आपदा के बाद राज्य सरकार ने प्रभावित लोगों के बैंक ऋण माफ करने की मांग की थी। केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि बैंक ऋण माफी का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक स्वतंत्र निकाय हैं जिनके निदेशक मंडल ही ऐसे निर्णय लेने के लिए अधिकृत हैं। केंद्र ने यह भी कहा कि वित्त मंत्रालय केवल नीतिगत दिशानिर्देश जारी करता है और बैंकों के आंतरिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने केंद्र के इस तर्क को "परेशान करने वाला" बताया। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “आप किसे बेवकूफ बना रहे हैं? संविधान में ऐसी शक्तियां दी गई हैं — सवाल यह है कि आपके पास कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति है या नहीं। जब गुजरात और राजस्थान को मदद दी जा सकती है, तो वायनाड को क्यों वंचित रखा गया?”
सुनवाई के बाद, हाईकोर्ट ने वायनाड आपदा पीड़ितों के खिलाफ सभी ऋण वसूली कार्रवाई पर रोक लगा दी और बैंकों को किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से रोक दिया। साथ ही अदालत ने बैंकों को इस मामले में पक्षकार बनाकर ऋण माफी पर अपना रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया।
केंद्र ने दोहराया कि आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत केंद्र सीधे ऋण माफी का आदेश नहीं दे सकता, यह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। हालांकि, अदालत ने कहा कि “यह अधिकार का नहीं, बल्कि इरादे का मामला है।”
क्या हुआ था वायनाड में:
वायनाड जिले में भीषण भूस्खलन से भारी जान-माल का नुकसान हुआ था। केंद्र ने पुनर्वास के लिए 260.56 करोड़ रुपये मंजूर किए थे, लेकिन राज्य सरकार और विपक्ष दोनों ने इस राशि को बेहद अपर्याप्त बताया। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस आपदा को “राष्ट्रीय आपदा” घोषित करने और विशेष राहत पैकेज की मांग की थी। वायनाड की सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा और यूडीएफ नेताओं ने भी गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर यही मांग दोहराई थी।
यह फैसला न केवल वायनाड के पीड़ितों के लिए बड़ी राहत है, बल्कि केंद्र की नीतिगत जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।