लाहौल-स्पीति में बढ़ा पर्यावरणीय खतरा — घेपन झील 33 साल में 173% बढ़ी, टूटी तो हिमाचल से पाकिस्तान तक आ सकती है तबाही
लाहौल-स्पीति/07/11/2025
हिमाचल प्रदेश की लाहौल-स्पीति घाटी में स्थित घेपन झील का स्वरूप चिंताजनक गति से बदल रहा है। सिस्सू के ऊपर लगभग 13,583 फीट की ऊंचाई पर मौजूद यह झील बीते 33 वर्षों में 173 प्रतिशत तक फैल चुकी है। विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन का साफ संकेत मान रहे हैं, क्योंकि घाटी में ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं और इसी पिघलते पानी से झील का आकार निरंतर बढ़ रहा है। वर्तमान में यह झील करीब 101.30 हेक्टेयर में फैली है और लगभग 2.5 किलोमीटर लंबी है। अध्ययन में इसकी लंबाई 2,464 मीटर और चौड़ाई 625 मीटर रिकॉर्ड की गई है। झील में लगभग 35.08 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी जमा है, जो इसे हिमाचल की सबसे बड़ी ग्लेशियल झीलों में शामिल करता है।
नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर और केंद्रीय जल आयोग द्वारा किए गए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि झील का बांधन (नेचुरल बैरियर) किसी कारण टूट गया, तो इससे बड़ी जलराशि अचानक नीचे की ओर बह सकती है, जिसके परिणामस्वरूप लाहौल घाटी से होते हुए जम्मू और पाकिस्तान तक भी तबाही पहुंचने की आशंका है। घाटी में पिछले कुछ वर्षों में मौसम के पैटर्न में उल्लेखनीय बदलाव दर्ज किए गए हैं—बर्फबारी की अवधि और तीव्रता बदल रही है और अब क्षेत्र में फ्लैश फ्लड की घटनाएं भी सामने आने लगी हैं।
लाहौल-स्पीति की उपायुक्त किरण बडाना ने बताया कि विशेषज्ञों और तकनीकी टीमों ने क्षेत्र का विस्तृत निरीक्षण किया है। जिले में पहली बार झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा, जो सैटेलाइट आधारित होगा और मौसम तथा झील के जलस्तर में किसी भी बदलाव की सूचना प्रशासन और मौसम विभाग को तुरंत भेजेगा। अटल टनल से आगे सिस्सू क्षेत्र पर्यटन का मुख्य आकर्षण बन चुका है, और वहां से लगभग 6–7 घंटे की पैदल यात्रा के बाद घेपन झील तक पहुंचा जाता है, जहां ट्रैकर्स अक्सर जाते हैं। अब प्रशासन ट्रैकिंग गतिविधियों पर भी सतर्क नजर रख रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन की गति इसी तरह जारी रही, तो झील का विस्तार और जोखिम दोनों बढ़ते रहेंगे। इसलिए लगातार निगरानी, वैज्ञानिक मॉनिटरिंग और समय पर चेतावनी ही इस संभावित प्राकृतिक संकट से निपटने का एकमात्र तरीका है।