पाकिस्तान में नमाज के दौरान हमला, अहमदिया मुस्लिमों पर फायरिंग, छह घायल
पुलिस की जवाबी कार्रवाई में हमलावर ढेर
इस्लामाबाद/11/10/2025
इस्लामाबाद। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के रबवाह शहर में शुक्रवार को नमाज के दौरान भयावह हमला हुआ। एक अज्ञात बंदूकधारी ने अहमदिया समुदाय के लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी, जिसमें छह लोग घायल हो गए। मौके पर तैनात पुलिस ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की और हमलावर को मार गिराया।
घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है, जिसकी पुलिस ने पुष्टि भी की है। हथियारबंद व्यक्ति मस्जिद परिसर के गेट की ओर बढ़ता है और वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों पर गोलियां चलाने लगता है। इस दौरान अंदर नमाज पढ़ रहे लोग चीख-पुकार मचाते हुए इधर-उधर भागने लगे।
मौके पर मौजूद एक गार्ड ने फौरन मस्जिद का दरवाजा बंद कर दिया, जिससे बड़ा हादसा टल गया। वहीं सड़क के दूसरी ओर तैनात पुलिसकर्मियों ने फायरिंग शुरू की और हमलावर को गोली मार दी। गोली लगने के बाद वह गिर पड़ा और मौके पर ही दम तोड़ दिया।
हमले की जांच शुरू, चरमपंथी कनेक्शन की आशंका
पुलिस ने पूरे इलाके को घेरकर जांच शुरू कर दी है। शुरुआती जांच में शक है कि हमलावर का किसी कट्टरपंथी संगठन से संबंध हो सकता है। अभी तक किसी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, हालांकि तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (TLP) जैसे समूह पहले भी अहमदिया समुदाय के पूजा स्थलों पर हमले कर चुके हैं।
अहमदिया समुदाय के प्रवक्ता आमिर महमूद ने हमले की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा, “देश में फैलाए जा रहे नफरत भरे भाषणों और धार्मिक उकसावे ने ऐसा माहौल बना दिया है, जिससे निर्दोष लोगों पर हमले बढ़ रहे हैं। अब वक्त आ गया है कि इन नफरत फैलाने वालों पर कार्रवाई की जाए।”
पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर लगातार अत्याचार
पाकिस्तान में करीब 20 लाख अहमदिया मुस्लिम रहते हैं। 1974 में संविधान में संशोधन कर उन्हें ‘गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक’ घोषित किया गया था। पंजाब में अहमदिया समुदाय के 36 लोगों को ईद की कुर्बानी से रोकने के लिए गिरफ्तार किया गया था।
अहमदियों को कुरान पढ़ने, नमाज अदा करने या इस्लामिक प्रतीकों के उपयोग तक की अनुमति नहीं है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान में उनके कब्रिस्तान और मस्जिदें तक अलग हैं।
अहमदिया संप्रदाय की स्थापना 1889 में पंजाब के कादियान (अब भारत) में मिर्जा गुलाम अहमद ने की थी। उन्होंने खुद को “खलीफा” घोषित किया और शांति, न्याय और मानवता के संदेश पर जोर दिया।
अहमदिया लोग खुद को इस्लाम का सच्चा अनुयायी मानते हैं और सभी धर्मों के पैगंबरों व संतों — जैसे कृष्ण, बुद्ध, जीसस, और गुरु नानक — की शिक्षाओं को सम्मान देने पर जोर देते हैं।
लेकिन 1974 में पाकिस्तान की संसद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के शासन में अहमदियों को “गैर-मुस्लिम” घोषित कर दिया। बाद में पाकिस्तान दंड संहिता में धारा 298 जोड़ी गई, जिसके तहत यदि कोई अहमदिया खुद को मुस्लिम कहे तो उसे तीन साल की जेल हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भेदभाव जारी
सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, कई इस्लामिक देशों में भी अहमदिया समुदाय के खिलाफ प्रतिबंध हैं। 1974 में मक्का की इस्लामिक फिक्ह काउंसिल ने एक फतवा जारी किया था, जिसमें अहमदिया मुसलमानों को “काफिर” घोषित किया गया।
सऊदी अरब ने 2018 में अहमदिया लोगों के हज पर प्रतिबंध लगा दिया था। वहां उन्हें हिरासत में लेकर वापस भेज दिया जाता है। कई देशों में अहमदिया अपनी पहचान छिपाने पर मजबूर हैं, ताकि गिरफ्तारी या हिंसा से बच सकें।
नफरत से शांति तक का सफर अब भी अधूरा
रबवाह की इस घटना ने एक बार फिर दिखाया है कि पाकिस्तान में धार्मिक असहिष्णुता कितनी गहराई तक जड़ें जमा चुकी है। जहां एक ओर सरकार धार्मिक सहिष्णुता की बातें करती है, वहीं दूसरी ओर अहमदिया जैसे अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले लगातार जारी हैं।
अब सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अपने ही नागरिकों को धर्म के नाम पर डर से मुक्त कर पाएगा? या फिर ऐसे ही हमले देश की “इस्लामी छवि” पर दाग लगाते रहेंगे?