शिमला नगर निगम में हंगामा: मेयर–डिप्टी मेयर का कार्यकाल 5 साल करने पर सत्ता–विपक्ष आमने-सामने
शिमला/30/10/2025
शिमला। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा नगर निगम में मेयर और डिप्टी मेयर का कार्यकाल ढाई वर्ष से बढ़ाकर 5 वर्ष करने के निर्णय ने शिमला नगर निगम की मासिक बैठक में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। बैठक शुरू होते ही भाजपा और कांग्रेस — दोनों के कई पार्षदों ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया। आरोप–प्रत्यारोप के बीच स्थिति इतनी खराब हो गई कि बैठक को कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ा।
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने जताया विरोध
बैठक के दौरान भाजपा पार्षदों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और इसे लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताया। दूसरी ओर, हैरानी की बात यह रही कि कांग्रेस के लगभग एक दर्जन पार्षद भी सरकार के इस फैसले से असहमत दिखे।
भाजपा पार्षद आशा शर्मा ने कहा कि जब रोस्टर में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान तय था तो उसे बदला नहीं जाना चाहिए था। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का यह फैसला महिला विरोधी है और कांग्रेस का “महिला विरोधी चेहरा” सामने आया है।
कांग्रेस पार्षदों ने भी जताई असहमति — बोले, फैसले से प्रतिनिधित्व खत्म
कांग्रेस पार्षद सिमी नंदा ने कहा कि वह सरकार और पार्टी के साथ हैं, लेकिन जो रोस्टर पहले से तय किया गया था, उसे बदलना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि पार्टी की राष्ट्रीय लाइन स्पष्ट है — हर किसी को बराबर प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
एक अन्य कांग्रेस पार्षद कांता सुयाल ने कहा कि इस बार नगर निगम में महिलाओं की संख्या अधिक है, इसलिए रोस्टर के अनुसार महिला मेयर का चयन होना चाहिए था। उन्होंने बताया कि भाजपा ने नारेबाजी करके विरोध जताया, जबकि कांग्रेस पार्षदों ने मौन प्रदर्शन किया।
सरकार के निर्णय के पीछे क्या है मामला?
हाल ही में हुई कैबिनेट बैठक में सरकार ने फैसला लिया कि:
मेयर और डिप्टी मेयर का कार्यकाल अब ढाई साल की जगह लगातार 5 साल होगा।
शिमला नगर निगम का ढाई साल का कार्यकाल 15 नवंबर को पूरा होने वाला था। नियम के अनुसार, उसके बाद मेयर पद महिला रोस्टर के तहत आरक्षित हो जाना था। लेकिन सरकार द्वारा कार्यकाल बढ़ाए जाने के बाद माना जा रहा है कि मौजूदा मेयर सुरेंद्र चौहान (जो CM सुक्खू के करीबी माने जाते हैं) अब पूरे कार्यकाल यानी 5 साल पद पर बने रहेंगे।
क्या यह फैसला प्रशासनिक निरंतरता के लिए है?
या फिर राजनीतिक लाभ के लिए रोस्टर सिस्टम को दरकिनार किया गया?
नगर निगम के भीतर विरोध की तीव्रता यह दिखाती है कि यह मुद्दा अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक टकराव में बदल चुका है।