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शिमला का अनोखा पत्थर मेला: जहां रक्त से होती है देवी की पूजा

शिमला/21/10/2025

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शिमला. हिमाचल प्रदेश का धामी क्षेत्र हर साल दिवाली के एक दिन बाद ऐसी परंपरा का साक्षी बनता है, जो पूरे देश में अनोखी है। यहां मनाया जाने वाला “पत्थर मेला” सदियों पुरानी रियासती परंपरा का प्रतीक है, जहां लोग देवी भद्रकाली को प्रसन्न करने के लिए एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। इस बार भी शिमला से लगभग 26 किलोमीटर दूर हलोग धामी गांव में मंगलवार को यह मेला आयोजित किया गया, जिसमें हजारों लोग दूर-दराज से शामिल होने पहुंचे।

दोपहर बाद तीन बजे के करीब मेले की शुरुआत परंपरागत पूजा के साथ हुई। राजघराने के सदस्य जगदीप सिंह ने पहले ग्राम देवता देव कुर्गुण और भगवान नरसिंह की विधिवत पूजा की। इसके बाद ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच जुलूस के रूप में लोग मेले स्थल “शारड़ा चौक” तक पहुंचे। यहां जैसे ही राजपरिवार की ओर से पहला पत्थर फेंका गया, वैसे ही दोनों ओर से पत्थरों की बारिश शुरू हो गई। देखते ही देखते पूरा मैदान जयकारों, शोर और पत्थरों की गूंज से भर उठा।

यह परंपरा कोई हिंसा नहीं बल्कि आस्था का प्रतीक मानी जाती है। कहा जाता है कि इस पत्थरबाजी में जब किसी के शरीर से रक्त की पहली बूंद टपकती है, तो उसी रक्त से मां भद्रकाली का तिलक किया जाता है। मान्यता है कि देवी की यह रक्ततिलक पूजा आने वाले साल में गांव को आपदाओं और दुर्भाग्य से बचाती है।

इस आयोजन में केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि आसपास के गांवों की टीमें — जैसे धगोई, जठौती, कटेड़ू और टुनसू — भी हिस्सा लेती हैं। इस दौरान देव कुर्गुण, नरसिंह और माता भीमकाली के पुजारी पूरे विधि-विधान के साथ मौजूद रहते हैं।

राजघराने के प्रतिनिधि जगदीप सिंह बताते हैं कि यह परंपरा पृथ्वी राज चौहान के वंशजों के समय से चली आ रही है। उनके अनुसार, “यह सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि हमारी विरासत और देवी आस्था का प्रतीक है। जब तक एक व्यक्ति के शरीर से रक्त नहीं निकलता, तब तक यह अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता।”

धामी का यह अनोखा पत्थर मेला हर साल लोगों के लिए कौतूहल और श्रद्धा का विषय बन जाता है। जहां एक ओर यह परंपरा आस्था से जुड़ी है, वहीं दूसरी ओर प्रशासन हर बार सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम भी करता है ताकि कोई बड़ी दुर्घटना न हो। बावजूद इसके, इस मेले में उमड़ने वाली भीड़ और स्थानीयों का उत्साह यह साबित करता है कि धामी की यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत और सम्मानित है, जितनी सदियों पहले थी।

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