सुक्खू सरकार का बड़ा फैसला: हिमाचल में नई पंचायतों पर रोक, केवल पुनर्गठन — चुनाव समय पर होने की तैयारी तेज
शिमला/03/11/2025
शिमला। हिमाचल प्रदेश में आगामी पंचायत चुनावों से पहले सुक्खू सरकार ने बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में फिलहाल नई पंचायतों का गठन नहीं होगा। अब केवल मौजूदा पंचायतों का पुनर्गठन (Re-organization) किया जाएगा। यानी सीमाओं में बदलाव संभव है, लेकिन पंचायतों की नई इकाइयों की संख्या नहीं बढ़ाई जाएगी।
सरकार का यह फैसला मुख्य रूप से आर्थिक और प्रशासनिक बोझ को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह के अनुसार, एक नई पंचायत बनाने पर सालाना लगभग 1.20 करोड़ रुपये का खर्च आता है, जबकि पंचायतों की खुद की आमदनी सीमित रहती है। ऐसे में सरकार ने नई पंचायतें बनाने के लिए आई 750 से ज़्यादा मांगों को खारिज कर दिया है।
वर्तमान में प्रदेश में 3,577 पंचायतें हैं। पहले संख्या 3,615 थी, लेकिन नए नगर निगम और नगर पंचायत बनने के बाद 42 पंचायतें कम हो गईं। वहीं, योल कैंट क्षेत्र में 4 नई पंचायतों के गठन के चलते थोड़े बदलाव हुए। प्रदेश में दस नए ब्लॉक बनने के बाद कुल 91 विकास खंड हो गए हैं, जिसकी वजह से कुछ पंचायतों और ब्लॉक सीमाओं में फेरबदल हुआ है।
प्रदेश की लगभग 80 पंचायतों में पुनर्गठन का कार्य चल रहा है। इन पंचायतों की सीमाएं इस तरह बदली जाएंगी कि ग्रामीणों को प्रशासनिक सुविधाएं अधिक सरलता से मिल सकें। जिला उपायुक्तों और खंड विकास अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि सभी लंबित पुनर्गठन प्रस्तावों को 15 नवंबर तक निपटा दिया जाए।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का कहना है कि सरकार का उद्देश्य संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है, न कि राजनीतिक दबाव में आकर नई इकाइयाँ बनाना। उनका कहना है कि प्राथमिकता प्रशासन को सुचारू और मजबूत बनाना है।
इस बीच, राज्य निर्वाचन आयोग ने भी चुनावी तैयारियों में तेजी ला दी है। आयोग ने सहायक निर्वाचन अधिकारी, पीठासीन अधिकारी और मतदान कर्मियों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यदि समय पर पुनर्गठन प्रक्रिया पूरी न हुई, तो चुनाव पुरानी सीमाओं के आधार पर करवाए जाएंगे, क्योंकि समय पर चुनाव करवाना आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है। संकेत मिल रहे हैं कि आयोग जनवरी में ही पंचायत चुनाव करवाने के लिए तैयार है।
राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जहां सरकार इसे जनहित में लिया गया व्यावहारिक निर्णय बता रही है, वहीं विपक्ष इसे जनभावनाओं की अनदेखी करार दे रहा है। चुनाव से पहले इस फैसले ने प्रदेश की पंचायत राजनीति में नया मोड़ ला दिया है।